घंटाघर

...वक़्त की हर शै ग़ुलाम

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Riyaz Hashmi, Jagran

Chief Sub Editor, Dainik Jagran Meerut.
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उदास चांद को तकता चला गया वो भी

Posted On: 19 Mar, 2012  
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इक झूठा लफ़्ज़ मोहब्बत का

Posted On: 13 Mar, 2012  
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सूनी आंखों में अहसास का समंदर

Posted On: 18 Feb, 2010  
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सोचो! आखिर कब सोचेंगे?

Posted On: 16 Feb, 2010  
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पंगे से भले दंगे

Posted On: 10 Feb, 2010  
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प्रतीक जाग गये, खुद तो जागो

Posted On: 1 Feb, 2010  
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Posted On: 1 Feb, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: allindianrightsorganization allindianrightsorganization

के द्वारा: omprakashyadav omprakashyadav

रियाज़ भाई, मुद्दत हो गई थी सिर्फ़ कवितायें ही लिख रहे थे, लेकिन इस यथार्थ वादी चित्रण से तो मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे कि इस लेख के माध्यम से आपने मेरे सामने गुड़गांव में बैठे बैठे, देवबंद से सहारनपुर के रास्ते में पड़ने वाले किसी ऐसे गांव का चित्र बना दिया हो जहां विकास जैसे शब्द तो एक मिथक बन चुके हैं। और वाकई विकास तो लोगो ने अपने बच्चों का नाम भी रखना छोड़ दिया होगा। खैर मैं तो मात्र सहारनपुर की बात कर रहा हूं, परन्तु ऐसे ना जाने कितने ही गांव होंगे जहां दलित शब्द अखबारों में भी सुर्खियां सिर्फ़ सियासी माहौल के गर्म होने पर बनता है। देखते हैं ये समाजवाद की लहर उत्तर प्रदेश में भी कुछ कर पाती है या फ़िर सिर्फ़ सिर्फ़ मुनिया ही होगी, विकास नही। खूबसूरत प्रस्तुति! अंकित...

के द्वारा: ankitmathur ankitmathur

के द्वारा:

सोचो | आखिर कब सोचेगे ??????? डॉक्टर नवाज़ देवबंदी की लिखी ये नज़म वाकई रोंगटे खड़े कर देने , और हमें इस बात का एहसास दिलाने के लिए काफी हे के हम खुद को और अपने देश को किस अँधेरी खाई में ले जा रहे हे . ये नज़म देश के उन ठेकेदारों को भी पढवानी चाहिए जो सिर्फ और सिर्फ अपने फाएदे के लिए फ़ालतू मुद्दे ढूँढ़ते हे. ये बिलकुल मानने वाली बात हे के पुणे में जो कुछ हुआ वो पुलिस और पर्शासन की लापरवाही का ही नतीजा हे लेकिन रियाज़ भाई में आपसे इस बात पर सहमत नहीं हूँ के महाराष्ट्र पुलिस एक फिल्म को रिलीज़ करने में लगी रही . तो क्या महाराष्ट्र सरकार को शिव सेना जेसे संगठनो के आगे झुक जाना चाहिए था. बात एक फिल्म के रिलीज़ होने तक सीमित नहीं थी मुद्दा था ऐसे गुंडों को सबक सिखाने का जो महाराष्ट्र सरकार ने किया जो उसे बोहोत पहले कर लेना चाहिए था मेरी नज़र में पुणे में जो कुछ हुआ उसके लिए ऐसे संगठन ही ज़िम्मेदार हे हमारे देश की विडम्बना यही हे के यहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा से कही जादा राजनीतिक विवाद बड़ा हो गया हे और ये सब वोट बैंक के लिए हे किसी को मराठी मानस की पड़ी हे तो किसी को हरित प्रदेश की. पुरे भारत देश की कोई नहीं सोचता हमने खुद ही अपने देश के टुकड़े कर डाले हे फिर हम दूसरो को दोष क्यों दे .क्योकि दुश्मन हमारी कमजोरी से वाकिफ हे और वो इसी का फ़ायदा उठाता हे कमी हमारे अन्दर ही हे. आपने इस गंभीर मुद्दे को उठाया बधाई के पात्र हे आप . आगे भी इसे ही लिखते रहे .

के द्वारा:

प्रिय भाई, एक बहुत जरूरी विषय पर विचार-विमर्श की शुरुआत के लिए धन्यवाद और बधाई। इस मुद्दे पर आपके विचारों से शुरू हुए क्रम को आगे बढ़ाते हुए यह जानना समीचीन होगा कि पिछले 30 वर्षों से लगातार आंतरिक और बाह्य आतंकवादी चुनौतियां झेल रहे होने के बावजूद हमारी देश के सुरक्षा ढांचे में आवश्यक परिवर्तन लगभग नहीं हुए हैं। अभिसूचना संग्रहण से लेकर सतर्कता, तैयारी और कार्रवाई के मौजूदा बहुस्तरीय और अति-विकेंद्रित सुरक्षा ढांचे में छेद ही छेद हैं। यही वजह है कि पिछले 30 वर्षों से भी अधिक समय से उग्रवादी, आतंकवादी तत्व बेरोकटोक देश के किसी भी हिस्से में हमला करके साफ निकल जाते हैं। कभी-कभार किसी हमलावर को पकड़ लेने को न तो सुरक्षा बलों की सफलता माना जा सकता है न ही ऐसी सफलताओं से राष्ट्र को द्रोही तत्वों द्वारा पहुंचाई गई क्षति की भरपाई होती है। देश में विश्वसनीय राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र के विकास और सुदृढ़ीकरण के लिए मौजूदा ढ़ांचे को पूरी तरह से समाप्त करके इसके पुनगर्ठन की आवश्यकता को समझे बिना सरकारें चुनौतियों से निपट लेने के पारम्परिक दावे भर करती रहेंगी। जन-प्रतिनिधि के रूप में संसद पहुंचे लोगों को समझना होगा कि सुरक्षित राष्ट्र की इच्छा और सुरक्षित राष्ट्र के बीच गहरी खाई है जिसे प्रतिबद्ध कार्रवाई से ही पार किया जा सकता है, दावे करके नहीं। आम लोगों को भी यह समझना चाहिए और अपने प्रतिनिधियों पर दबाव बनाना चाहिए कि वे राज्यस्तरीय और राष्ट्रस्तरीय सुरक्षा ढांचों में आवश्यक परिवर्तनों के लिए सचेष्ट हों। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक आतंकी हमलों में हुई मौतों का आंकड़ा बढ़ता रहेगा और लोग इन स्थितियों पर अपने ड्राइंग-रूमों में बैठे काफी या चाय के साथ भय गटकते हुए क्षणिक शोक की अभिव्यक्ति करते हुए सरकार को कोसते रहेंगे।

के द्वारा:

के द्वारा:

हम राष्ट्रपति की ओर से विशिष्ट सेवाओं के लिए पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को 15 अगस्त को ‘पुलिस पदक’ और 26 जनवरी को ‘दीर्घ एवं सराहनीय सेवा पदक’ प्रदान किये जाते हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय राज्यों के गृह सचिवों से ऐसे पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के नामों का प्रस्ताव मांगता है। ये पदक आईपीएस से लेकर पीपीएस, इंस्पेक्टर, दरोगा, हेड कांस्टेबल और कांस्टेबल तक को प्रदान किये जाते हैं। पर हमें उन कर्मचारियों के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए जो अपने कम को बोझ समझते है और गरीब लोगो को पेरशान करते है और उनसे कम करने के लिए रिश्वत की मांग करते है.ऐसे लोगो के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए और उन्हें पुलिस मई पकद्वाना चाहिए.

के द्वारा:

भाई पुरस्‍कारों और सम्‍मानों का खेल सभी जानते हैं। हो सकता है इनकी शुचिता और इन्‍हें देने में अर्हताएं तय करने में कभी मान मर्यादा की चिंता रही हो। मगर अब तो समय और समाज के लिहाज से सब कुछ पुराना पड़ चुका है। अपराधी और माफ‍िया सर्वोच्‍च सदनों की शोभा बढ़ाते हैं। 15 अगस्‍त और 26 जनवरी को राष्‍ट्रीय ध्‍वज की सलामी लेते हैं। एक अदद खाकी वर्दी को ईमान की तरह मानने वाले जवान खून का घूंट पीकर ऐसे माननीय बने अपराधियों को सलाम ठोकते हैं। सब कुछ तो जैसे पटरी से उतर गया है। पुरस्‍कारों का यह हश्र सिर्फ राष्‍ट्रपति पदक तक नहीं है। पदम श्री पुरस्‍कारों के बारे में आपने सुना ही। किन्‍ही संतो सिंह चटवाल को दे दिया गया। जिन्‍हें देश के केन्‍द्रीय खुफ‍िया विभाग खोजता रहा। हो हल्‍ला मचा तो बड़ी बेहयाई से गृह मंत्रालय ने सफाई पेश करते हुए चटवाल को क्‍लीन चिट दे दी। दंगा कराने वाले अफसर ही पुरस्‍कृत होंगे क्‍योंकि पूरे तंत्र पर उन्‍हीं का वर्चस्‍व है। वैसे भी इस तरह के पुरस्‍कार जनसेवी होने पर नहीं मिलते।

के द्वारा:

के द्वारा:

रियाज़ भाई, वर्तमान प्रशासनिक सेवायें एक खास किस्म के राजनैतिक पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। और इसी के चलते इन सभी पुरस्कारों एवं पदकों की विशिष्टता दिन ब दिन कमतर होती जा रही है। आपने सही ही लिखा है, कि जो लोग वास्तविक रूप से इस प्रकार के पुरस्कारों के लिये योग्य होते हैं उन्हे किसी राजनैतिक शरण प्राप्त ना होने के कारण अपना बोरिया बिस्तरा हर समय तैयार रखना होता है। आपने तो फ़िर भी प्रादेशिक स्तर के पुलिस सेवा पदक की बात उठाई है, जो कि अपने आप में एक सराहनीय कदम है, लेकिन आप ये देखिये कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक ख्याति रखने वाले भारतीय पद्म पुरस्कार भी अब विवादों से दूर नहीं, सी बी आई एवं अन्य एजेंसियों द्वारा इन लोगों पर गम्भीर जांच चल रही होती है, लेकिन अपने राजनैतिक आकाओं की मदद से ये सब इनके लिये एक खिलवाड़ से ज़्यादा नही रह जाता है। इसी लिये पंगे बाज़ों के लिये आत्म संतुष्टि से बड़ा कोई पुरस्कार या पदक नही होता, और ये बात पंगे बाज़ अच्छी तरह समझते भी हैं। धन्यवाद अंकित माथुर...

के द्वारा: ankitmathur ankitmathur

रियाज भाई, हमारा काम है आवाज लगाते चलना, कोई जागे न जागे उसका मुकद्दर। जी हां, बात अंधविश्वास दूर करने की ही हो रही है। देश में व्याप्त अंधविश्वास, कुरीतियों को दूर करने के लिए कई स्तरों से प्रयास हो रहे हैं। कुछ लोग जागते भी हैं, लेकिन बहुत सारे लोगों की भीड़ में वो दुबारा सो जाते हैं। आप उन्हें लाख समझाइए, लेकिन पनाला वहीं गिरेगा। यह सब देखकर लगता है कि चाहे कोई कितना भी दावा करे कि वही है भारत के जन-गण-मन का भाग्यविधाता। सबसे बड़ा तुर्रम खां वही है और उसी की बदौलत हिंदुस्तान चल रहा है, पर यह उसका यह दावा करना गलत ही होगा, क्योंकि सचमुच ही यह देश भगवान भरोसे चल रहा है। हालांकि आपने बहुत सारे लोगों का दिमाग और आंखें खोल दी है, लेकिन देखना यह है कि वे कब तक अपनी आंखें और दिमाग को खुला रखते हैं।

के द्वारा:

हमारा काम है आवाज लगाते चलना, कोई जागे न जागे उसका मुकद्दर। जी हां, बात अंधविश्वास दूर करने की ही हो रही है। देश में व्याप्त अंधविश्वास, कुरीतियों को दूर करने के लिए कई स्तरों से प्रयास हो रहे हैं। कुछ लोग जागते भी हैं, लेकिन बहुत सारे लोगों की भीड़ में वो दुबारा सो जाते हैं। आप उन्हें लाख समझाइए, लेकिन पनाला वहीं गिरेगा। यह सब देखकर लगता है कि चाहे कोई कितना भी दावा करे कि वही है भारत के जन-गण-मन का भाग्यविधाता। सबसे बड़ा तुर्रम खां वही है और उसी की बदौलत हिंदुस्तान चल रहा है, पर यह उसका यह दावा करना गलत ही होगा, क्योंकि सचमुच ही यह देश भगवान भरोसे चल रहा है। हालांकि आपने बहुत सारे लोगों का दिमाग और आंखें खोल दी है, लेकिन देखना यह है कि वे कब तक अपनी आंखें और दिमाग को खुला रखते हैं।

के द्वारा:

के द्वारा:

अब इसमें मंत्री जी को हम क्‍या दोष दें और कैसे दोष दें। छुटभैये से शुरू उनकी नेतागीरी की रेल में कोई ऐसा प्‍लेटफार्म आयेगा उन्‍हें मालूम ही कहां था। आखिर नेता‍गीरी करने से पहले उन्‍हें यह भी तो मालूम नहीं था कि कभी रेल मंत्री का पद भी संभालना पडेगा। ऐसे में रेल हादसों के दौरान आयोजित प्रेस कांफ्रेस को भी उन्‍होंने पार्टी दफ़तर की बैठक समझ लिया। कहते भी हैं कडुवा कडुवा गप्‍प। ऐसे में उम्‍मीद के खिलाफ जवाब तो मिलना ही था क्‍योंकि हम चुनाव ही ऐसे लोगों का करते हैं जो जगलर किस्‍म के हों। किसी के लिए कुछ कर सकें या न कर सकें लेकिन दिखायी यही पडता हो कि ये किसी के लिए कुछ भी कर सकने में सक्षम हैं।

के द्वारा: Suneel Pathak Jagran Faizabad Suneel Pathak Jagran Faizabad

Riyaz bhai u tuch the right point @ right time “I totally agree that parents are forcing their unfulfilled dreams on children. They are using the child as a trophy,” With both parents without time to talk to kids, suicides are often an attention-seeking device for the kids. Unfortunately, most do not realise the ultimate consequence of their action, “While there’s too much exposure to acts of violence and crime, parents do not talk to the child about it… Conversations should not just be study-centric,” Many educationists suggest compulsory training on guidance and counselling for teachers so that they are better equipped to deal with the mental uncertainties among students. Respondents also highlighted peer pressure as the culprit. Also, most (97%) did not hold the movie, 3 Idiots, responsible for suicides or ragging instances. “Several blamed the media and its tendency to highlight toppers. They also blamed coaching classes with their hoardings on toppers. They said it creates huge pressure on students to score more so that even they can get their two seconds of glory,” While student counseling is common, 53% said parents and teachers need it more. Counsellors and psychiatrists said parents need to be counselled on how to bring up a child and changes they must bring about in their parenting style at various stages of the child’s growth. “Parents may feel they are doing a lot for the child, spending on education and other needs. They probably think all they are asking for is that the kid studies. So I won’t blame the parents, but they need to change the way of disciplining according to the child’s age,” parents often reflect what the society and the system imposes and they fall into the trap. “So though a child would be happy studying media, parents may want him/her to do engineering or become a doctor as society attaches more importance to that. Parents also feel we are giving the best and so expect a lot in return. Hence, the pressure gets created in the child,” So my request to all Parents Pls love ur child first & talk every think to him daily so if he/she having any pressure so discuss with u

के द्वारा:

रियाज़ भाई, सच कहा आपने........दरअसल स्कूली शिक्षा से मरहूम, गुनाहों की गिरफ्त में जी रहे छोटे-छोटे बच्चों की तकलीफ तभी समझ आएगी, जब उनका होकर उन पर स्टडी की जाये. या फिर हमने भी उन्ही की मानिंद जिंदगी गुजारी हो. मुझे याद आता है रियाज़ साहब एक बार बचपन के दिनों में दिल्ली में मैं भी एक बूचड़खाने (शायद वो बूचड़खाने ही था) से जान बचा कर भागा था. दरअसल, आदतन घरवालों ने बहार निकाल दिया था और बार-बार बहार निकाले जाने की उनकी आदतों से परेशां होकर मैं निक्कर-शर्ट-स्लीपर में ही दिल्ली पहुँच गया था. जहाँ मेरे साथ ये वाक्य गुज़रा. खैर, अल्लाह का करम रहा कि मैं गुनाहों की सिम्त जाने से बच गया, लेकिन बदनसीबी आज तक मेरे साथ है. आपने जो स्टडी बयान की है, मुझे वो वापस दिल्ली ले गई. अपना ही एक शेर कहूँगा कि - वही है बचपन अगर जो मैंने गुज़ारा है, तो मेरे ख़ुदा किसी को कभी बचपन ना मिले.

के द्वारा:




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